मोदी सरकार का सबसे बड़ा राफेल घोटालें पर कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने, जानिऐ राफेल घोटालें क्या है।

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2001 के बाद से भारतीय वायुसेना को लगभग 200 मध्यम मल्टी–रोल लड़ाकू विमान (MMRCA) की सख्त आवश्यकता थी। यूपीए सरकार ने 2007 में भारतीय वायु सेना की इस मांग को मंजूरी दी और विभिन्न कंपनियो से टेंडर मंगवाने की शुरुआत किया.

भारतीय वायु सेना ने विभिन्न मध्यम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट निर्माताओं के विभिन्न उत्पादों का बड़े पैमाने में परीक्षण किया जिसमे अमेरिकी F-16 और F-18, रूसी मिग 35, स्वीडिश साब ग्रिपन सहित यूरोफाइटर टाइफून और फ्रांसीसी दसॉ (Dassault) एविएशन कंपनी के राफेल विमान शामिल थे। अंतिम फैसला लेने से पहले इन्हे 4 वर्षो तक अलग–अलग जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों में विश्वसनीयता और संचालन संबंधी व्यवहार्यता को समझने के लिए टेस्ट किया गया। इन सब परीक्षणो के बाद यूरॉफ़ाइटर और राफेल को अंतिम बोली के लिए चुना गया।

यूरोफाइटर (ए ई डी एस) और राफेल के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा के बाद, 2012 में राफेल ने सबसे कम बोली लगा कर (उत्पाद चक्र के रखरखाव की लागत कम होने के कारण ) यह सौदा जीता। वह 10.2 अरब डॉलर में 126 राफेल विमान देने वाली थी, जिसमे 18 विमानों को रेडी–टू–फ़्लाई हालत में दिया जाना था और बाकी 108 विमान HAL (हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड) द्वारा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के माध्यम से भारत मे बनाये जाने थे।

सौदे में अन्य कई और फ़ायदेमंद चीज़े भी थी, जैसे की देश को इस समझौते के साथ भारत में 50% राजस्व का निवेश भी करना था, साथ ही अपने देश में विमान के स्पेयर पार्ट्स बनाने से नौकरियों में भी वृद्धि होती, जिससे यूवाओं को नौकरी मिल सकती थी कांग्रेस सरकार 526.10 करोड़ प्रति राफेल विमान की दर से 126 विमान खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी थी l


मोदी सरकार और राफेल डील में बदलाव |

भारत में मई 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी सरकार बनी। अपने कार्यकाल के पहले वर्ष के अंत में प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस के दौरे पर गए और फ्रांसीसी कंपनियों को मेक इन इंडिया कार्यक्रम के तहत भारत के साथ करार करने का निमंत्रण दिया। मोदी ने यह निमंत्रण सिविल न्यूक्लियर एनर्जी, डिफेंस और फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र की फ्रांसीसी कंपनियों को दिया। अपने इसी दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी ने पेरिस से डील का ऐलान किया।

पुराने कॉन्ट्रैक्ट को रद्द करते हुए नई डील की गयी जिसके मुताबिक अब भारत को महज 36 लड़ाकू विमान खरीदने थे। लिहाजा पूरी डील पर सरकार को सिर्फ 8.9 बिलियन डॉलर खर्च करने थे। खासबात यह थी कि सभी के सभी 36 लड़ाकू विमानों को फ्रांस में ही निर्मित किया जाएगा और तैयार विमान भारत को सौंपे जाएंगे l

नई डील का विवादित एवं छुपा हुआ पहलू |

इस डील के साथ ही भारत और फ्रांस की सरकार के बीच समझौता किया गया कि इस डील से हुई कुल कमाई का आधा हिस्सा कंपनी को एक निश्चित तरीके से वापस भारत में निवेश करना होगा। डील के इस पक्ष को ऑफसेट क्लॉज कहा गया। लिहाजा, डील के तहत दसॉल्ट को यह सुनिश्चित करना था कि वह 8.9 बिलियन डॉलर की आधी रकम को वापस भारत के रक्षा क्षेत्र में निवेश करे l

दसॉल्ट ने HAL के साथ अपना करार रद्द करते हुए अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप से करार कर लिया। खास बात यह है कि इस वक्त तक रिलायंस के पास रक्षा क्षेत्र की मैन्यूफैक्चरिंग तो दूर उसे एविएशन सेक्टर का भी कोई तजुर्बा नहीं था। जबकि एचएएल के पास रक्षा क्षेत्र में मैन्यूफैक्चरिंग का 78 साल का तजुर्बा था और वह इस ऑफसेट क्लॉज में एक मात्र कंपनी थी जिसके पक्ष में फैसला किया जाता. HAL को इस तरह से बाहर करना और अंबानी ग्रुप के साथ करार सीधे सीधे मिलीभगत की ओर इशारा करता है जहां देशहित के ऊपर व्यक्तिगत हित को तरजीह दी गयी l

UPA सरकार का अनुबंध और HAL के साथ क्यू उचित था?

मूल अनुबंध में एचएएल के साथ भागीदारी व टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, भविष्य में भारत की क्षमता के विकास के एक रणनीतिक उद्देश्य के साथ था। भारत हमेशा अन्य देशों से इतने महँगे विमान नही खरीद सकता। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और भारत मे HAL द्वारा 108 विमानों का निर्माण मूल सौदे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था, जिसे मोदी ने खत्म कर दिया था। याद रखिये कि वायुसेना की आवश्यकता और अधिक विमानों की है, इसलिए अपने पैरों पर खड़े होकर, आत्मनिर्भरता प्राप्त करना बहुत ज़रूरी था l

राफेल डील पर हंगामा, कांग्रेस और बीजेपी आमने सामने |

कांग्रेस सरकार 526.10 करोड़ प्रति राफेल विमान की दर से 126 विमान खरीदने की प्रक्रिया शुरू कर चुकी थी तब मोदी सरकार 1670.70 करोड़ डॉलर प्रति विमान सिर्फ 36 विमान के खरीद की मंजूरी ही क्यों दी?
इन सारे मुद्दों को विस्तार में समझते हुए संसद में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी जी द्वारा सबाल उठाये जाने पर प्रधानमंत्री बयान नहीं देते और रक्षा मंत्री इन बातों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ बहाना बना रही हैं जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ उसकी प्रोद्योगिकी हस्तान्तरण को गोपनीय रखने तक तो समझ में आती है जो कि हो रहा है।

फ्रांस के प्रमुख अखबार फ्रांस 24 ने कहा है कि आखिर कैसे 2007 में शुरू हुई डील से 2015 में हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को बाहर करते हुए निजी क्षेत्र की रिलायंस डिफेंस को शामिल किया गया?
फ्रांस 24 के मुताबिक इस डील के वक्त भारत का मानना था कि इस डील से भारत सरकार की एरोस्पेस और डिफेंस कंपनी एचएएल की आधुनिक उत्पादन क्षमता में इजाफा होगा और वह देश के लिए लड़ाकू विमान बनाने के लिए तैयार जाएगी l


फ्रांस भी उठाया मोदी सरकार पर सवाल |

फ्रांस 24 ने दावा किया कि भारत में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने एक अन्य फ्रांसीसी अखबार को दिए इंटरव्यू में सवाल खड़ा किया कि आखिर किस आधार पर इस डील से एक अनुभवी कंपनी को बाहर करते हुए एक ऐसी कंपनी को जगह दी गई जिसने इस क्षेत्र में कभी काम नहीं किया। इसके साथ ही फ्रांस 24 ने दावा किया कि दसॉल्ट ने जिस भारतीय कंपनी को एचएएल की अपेक्षा तरजीह दी उस कंपनी को इस डील से महज 15 दिन पहले ही स्थापित किया गया। खासबात यह है कि कंपनी को स्थापित करने की यह तारीख प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के फ्रांस दौरे से महज 13 दिन पहले की है। वहीं फ्रांस 24 ने यह भी मुद्दा उठाया है कि प्रधानमंत्री की इस यात्रा में शामिल कारोबारियों ने अनिल अंबानी भी मौजूद थे।

रक्षा विश्लेषक डी रघुनाथ ने भी अपने इस लेख में पुराने कॉन्ट्रैक्ट और नए समझौते के बीच के अंतर को विस्तार में समझाया है। आप खुद ही सोचे कि लगभग 8.9 अरब डॉलर में 36 विमान वह भी सिर्फ 5 साल के रख रखाव के साथ लिए, बिना तकनीकी हस्तांतरण के जब कि लगभग उतने ही रुपयों में 126 विमान 40 साल के रखरखाव के साथ मिलने थे, तकनीकी हस्तांतरण के साथ। ये घोटाला नहीं तो क्या है?

अगर भारत की वायु श्रेष्ठता कम होना मुद्दा था तो एक कंपनी (दसॉ) के साथ जाने के बजाय भारत, दुसरे विकल्प यूरोफाइटर टाइफून के लिए भी बातचीत कर सकता था क्योंकि भारतीय वायुसेना ने तो केवल कम खर्चे के आधार पर राफेल को चुना था जबकि वह फायदा अब नही हो रहा था।


कांग्रेस का आरोप यह मोदी सरकार का बहुत बड़ा घोटाला है |

स्वीडन के SAAB ने ग्रिपेन विमानों के लिए, और अमेरिका की लॉकहीड मार्टिन अपने F16 विमानों के लिए, घोषणा की थी कि वे पूरी तरह से भारत में उत्पादन सुविधा को पुनर्स्थापित करने के लिए तैयार हैं। अब तो ये भी नहीं हो रहा. फिर भी मोदी ने एक ऐसी कंपनी के साथ सौदा किया जो हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने के लिए तैयार नहीं थी। मोदी ने वित्त मंत्री और रक्षा मंत्री के साथ अंतिम विवरणों पर चर्चा करे बिना राफेल की खरीद के फैसले में जल्दबाजी क्यों की ?

यहां हैरानी की बात ये है कि जब भी विपक्ष इस पर सवाल उठाता है तो उसे बोफोर्स घोटाले का हवाला देकर चुप कराने की कोशिश की जाती है l बताते चले कि बोफोर्स घोटाला 64 करोड़ रुपये का था जबकि राफेल का सौदा 59,000 करोड़ का है और दूसरी बात कि अगर पिछली सरकार में कोई घोटाला हुआ है तो इसलिए हम क्या इसे वर्तमान में भी होने दे?

राफेल डील पर मचा बवाल अब सीधे सीधे कांग्रेस बनाम अंबानी की लड़ाई बन चुका है और अंबानी ने तो कांग्रेसी नेताओं को लीगल नोटिस भेज दिया है कि बिना सुबूत के कोई आरोप न लगाए l कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला, अशोक चव्हाण, संजय निरुपम, अनुग्रह नारायण सिंह, ओमान चांडी, शक्तिसिंह गोहिल, अभिषेक मनु सिंघवी, सुनील झाकड़ और प्रियंका चतुर्वेदी को इस मुद्दे पर लीगल नोटिस भेजा है l

लेखक : रीता शर्मा, (MBA)
बहराईच ( उत्तर प्रदेश )

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